उत्तर प्रदेश: खौफ के खात्मे से 'कानून के शासन' तक का सफर — एक सांख्यिकीय विश्लेषण

उत्तर प्रदेश: खौफ के खात्मे से 'कानून के शासन' तक का सफर — एक सांख्यिकीय विश्लेषण

Uttar Pradesh

The Journey from the Eradication of Fear to the 'Rule of Law

Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश में अपराधी बेहाल और आमजन खुशहाल हैं, यह दावा है या दस्तावेज़ी हकीकत? यह सवाल केवल राजनीति का नहीं है, हर जागरूक नागरिक का है। क्या सचमुच उत्तर प्रदेश बदल गया है… या यह सिर्फ एक सियासी दावा है? क्या अब सड़क पर चलता नागरिक सुकून से सांस ले पा रहा है या खौफ अब भी परछाईं की तरह साथ चलता है? क्या निवेशक भरोसे के साथ अपने फैसले कर रहा है या असुरक्षा अब भी उसके इरादों को रोकती है? क्या कानून अब किताबों से निकलकर ज़मीन पर उतरा है, या अब भी फाइलों में ही दम तोड़ देता है? सवाल कई हैं और जवाब आसान नहीं। लेकिन इन सवालों से बचा भी नहीं जा सकता। तो आइए, इनका जवाब खोजते हैं, बयानों में नहीं, बहसों में नहीं…आंकड़ों की सरपरस्ती में, दलीलों की निगेहबानी में।

जब हम इस तलाश की पहली सीढ़ी पर कदम रखते हैं, तो सबसे पहले वही पुराना जख्म सामने आता है- दंगों का। कभी यही प्रदेश दंगों की धूल से ढका रहता था, लेकिन जब 2017 के बाद के पन्ने पलटते हैं, तो एक अजीब-सा सन्नाटा मिलता है क्योंकि एक भी सांप्रदायिक दंगा या जातिगत संघर्ष दर्ज नहीं हुआ। यह सन्नाटा उस व्यवस्था का है, जिसने अराजकता को आदत बनने से पहले ही रोक दिया। यह नीति का परिणाम और नीयत का प्रमाण है!

यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 'ज़ीरो टॉलरेंस' नीति का असर है कि जहां कभी भय की परछाइयां थीं, वहां आज कानून की मौजूदगी महसूस होती है।

अपराधियों के खिलाफ हुई कार्रवाई में यह मौजूदगी और स्पष्ट दिखाई देती है। कई लोग आलोचनात्मक अंदाज में आज भी कहते हैं कि अपराध तो अब भी हो रहे हैं। सच भी है। किंतु मुद्दा यह है कि सिस्टम रिएक्ट करता है या कंट्रोल करता है। यूपी में अब रिएक्शन नहीं, प्री-एम्प्टिव एक्शन है। विगत 09 वर्षों में 267 दुर्दांत अपराधियों का मुठभेड़ों में ढेर होना, 10,990 का घायल होना और 22,306 इनामी अपराधियों का सलाखों के पीछे पहुंचना यह दर्शाता है कि अब पुलिस डिफेंसिव नहीं, ऑफेंसिव मोड में है। अब शासन केवल व्यवस्था नहीं संभालता, बल्कि व्यवस्था को लागू भी करता है। यह वही प्रशासनिक इच्छाशक्ति है, जो योगी के नेतृत्व की पहचान बन चुकी है।

85,118 अपराधियों पर गैंगस्टर एक्ट और 977 पर NSA की कार्यवाही यह स्पष्ट करती है कि अब लड़ाई किसी एक अपराधी से नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र से है जिसमें अपराध पनपता था। और जब यह तंत्र टूटता है, तो उसकी जड़, उसकी दौलत भी बच नहीं पाती। गैंगस्टर अधिनियम के अन्तर्गत मार्च, 2017 से दिसंबर 2025 तक ₹14,580 करोड़ से अधिक लागत मूल्य की चल/अचल अवैध सम्पत्तियों का जब्तीकरण महज आंकड़े नहीं, उस साम्राज्य के ढहने की आवाज़ हैं, जो कभी अजेय लगता था।

जब यह लड़ाई न्यायालय तक पहुंचती है, तो परिणाम भी बदलते हैं। 35 माफिया और 94 सहयोगियों को आजीवन कारावास तथा 2 को मृत्युदंड मिलना यह स्थापित करता है कि अब न्याय केवल प्रक्रिया नहीं, परिणाम बन चुका है। यही परिवर्तन समाज में भी दिखाई देता है। वर्ष 2016 की तुलना में डकैती में 90 प्रतिशत, लूट में 85 प्रतिशत, हत्या में 47 प्रतिशत, बलवा में 70 प्रतिशत, फिरौती के लिए अपहरण में 62 प्रतिशत, दहेज हत्या में 19 प्रतिशत और बलात्कार में 53 प्रतिशत की कमी केवल आंकड़े नहीं, बल्कि डर के सिकुड़ने और भरोसे के बढ़ने की कहानी है।

यह बदलाव तकनीक से जुड़कर और सशक्त होता है। प्रदेश के सभी 75 जिलों में साइबर क्राइम थानों की स्थापना, थानों में साइबर हेल्प डेस्क और ₹48 करोड़ 45 लाख से अधिक की धनराशि फ्रीज होना यह दर्शाता है कि पुलिसिंग अब डिजिटल युग के अनुरूप ढल चुकी है। IIT कानपुर, IIT मद्रास, राष्ट्रीय रक्षा यूनिवर्सिटी और नेशनल फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में प्रशिक्षित साइबर कमांडो और Cy-Train पोर्टल के माध्यम से 65,608 पुलिसकर्मियों का प्रशिक्षण यह बताता है कि यह परिवर्तन सतही नहीं, बल्कि संस्थागत है।

जब यह तकनीक पारदर्शिता से जुड़ती है, तो UPCOP ऐप के माध्यम से 50 लाख से अधिक डाउनलोड और 2 करोड़ 10 लाख से अधिक एफआईआर दर्ज होती हैं। मतलब अब शिकायतें दबती नहीं, दर्ज होती हैं। सिस्टम से टकराती हैं और जवाब लेती हैं।

फॉरेंसिक व्यवस्था में भी बदलाव साफ दिखता है। पहले जहां केवल 4 फॉरेंसिक लैब थीं, वहीं आज 12 सक्रिय प्रयोगशालाएं कार्यरत हैं और 6 नई स्थापित की जा रही हैं। अब अपराध केवल पकड़ा नहीं जाता, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी होता है।

संरचनात्मक विस्तार इस परिवर्तन की रीढ़ है। 134 नए थाने, 86 नई चौकियां, 78 महिला परामर्श केंद्र, 75 विद्युत निरोधक थाने, 10 सतर्कता अधिष्ठान थाने, 4 आर्थिक अपराध इकाई थाने, 73 साइबर क्राइम थाने और 6 नारकोटिक्स थानों की स्थापना, ये इमारतें नहीं, भरोसे की बुनियाद हैं।

महिला सुरक्षा के क्षेत्र में यह बदलाव और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। 19,839 महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति, 9,172 महिला बीट्स का निर्माण और प्रत्येक थाने में मिशन शक्ति केंद्र की स्थापना यह सुनिश्चित करती है कि सुरक्षा अब केवल घोषणा नहीं, अनुभव बन चुकी है। इसके परिणाम भी सामने हैं। सितंबर 2025 से दिसंबर 2025 के बीच बलात्कार में 33.92 प्रतिशत, महिलाओं एवं बच्चों के अपहरण में 17.03 प्रतिशत, दहेज हत्या में 12.96 प्रतिशत और घरेलू हिंसा में 9.54 प्रतिशत की कमी यह बताती है कि नीति और परिणाम के बीच की दूरी कम हुई है। ITSSO पोर्टल पर 98.90 प्रतिशत निस्तारण और 0.20 प्रतिशत पेंडेंसी के साथ प्रदेश का देश में प्रथम स्थान यह प्रमाणित करता है कि अब न्याय केवल उपलब्ध नहीं, प्रभावी भी है।

वहीं यूपी-112 द्वारा 3 करोड़ 10 लाख से अधिक कॉल अटेंड करना, 7,52,422 साइबर सूचनाओं का संज्ञान लेना और रिस्पॉन्स टाइम को 1 घंटा 5 मिनट से घटाकर 6 मिनट 41 सेकंड करना यह दर्शाता है कि अब सहायता केवल आश्वासन नहीं, त्वरित अनुभव है और यही सुशासन का मूल तत्व है।

और यह व्यवस्था तब अपने सबसे मानवीय रूप में दिखाई देती है, जब सोशल मीडिया संकेतों के आधार पर 1,769 लोगों का जीवन बचाया जाता है। यह केवल पुलिसिंग नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन का उदाहरण है।

आज जब महाकुंभ-25 में स्थापित ICCC और सोशल मीडिया सेंटर की पहल को स्कॉच अवार्ड (गोल्ड) से सम्मानित किया जाता है, जब उत्तर प्रदेश पुलिस दुनिया की पहली ऐसी एजेंसी बनती है जो सोशल मीडिया के माध्यम से जीवन बचाने का मॉडल प्रस्तुत करती है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि यह परिवर्तन केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि नेतृत्व-प्रेरित परिवर्तन है।

और अंततः, जब इन तमाम तथ्यों को एक साथ देखा जाए, तो यह उस शासन की कहानी बन जाती है, जिसने कानून को प्राथमिकता और नागरिक को केंद्र में रखा। आंकड़ों की पगडंडी पर इतनी दूर आकर सवाल खुद जवाब देने लगते हैं। अपराधियों की बदहाली सिर्फ दावा नहीं रहा, बल्कि दस्तावेज़ी सच बन चुका है।

अपराध की कालिमा सचमुच छंट रही है। कानून की रोशनी जमीन पर उतर रही है और अपराधी, जो कभी व्यवस्था पर भारी थे, आज उसी व्यवस्था के आगे बेबस, बेहाल और बेनकाब खड़े हैं।

यह बहस हो सकती है कि सफर अभी अधूरा है, लेकिन सफर की दिशा पर अब कोई सवाल नहीं है। क्योंकि वक्त की गर्द हकीकत को ढक तो सकती है, मिटा नहीं सकती और जब बदलाव सच बन जाए, तो वह सिर्फ दिखता नहीं, इतिहास लिखता है।

जो था कल तक खौफ, किस्सों में ढल गया
कानून जो जागा तो हर मंजर बदल गया
अब फैसले वक्त नहीं, निज़ाम खुद करता है
ये वो दौर है, जहां जुर्म झुककर पिघल गया